Saat Geet Varsh

सात गीत-वर्ष

धर्मवीर भारती की सृजन श्रृंखला में सात गीत-वर्ष का विशिष्ट स्थान है । जिन महत्त्वपूर्ण कविताओं के कारण भारती ने नयी काव्यधारा में अपना सुनिश्चित प्रतिष्ठित स्थान बनाया उनमें से अधिकतर कविताएँ इसी संकलन में संगृहीत हैं । इस संकलन की कविताओं का रचनाकाल 1951 से 58 तक है। यही वह समय है जब हिन्दी काव्यधारा एक विलक्षण ऐतिहासिक मोड़ ले रही थी । उस समय कविता में व्यक्तिवादी या सामाजिक आग्रह की भूमिकाओं को बड़े भ्रमात्मक ढंग से उठाया जा रहा था। उसी दौरान प्रकाशित सात गीत- वर्ष की इन कविताओं में नयेपन के साथ एक ताज़गी भी थी। इनमें एक ताज़ा गहरा युग बोध, इतिहास की सामूहिकता और कर्तव्य की निजी पीड़ा के बीच के तनाव की छटपटाहट तो ही, एक समाधान खोजने की आस्था भी थी। भारतीय ज्ञानपीठ भारती साहित्य के विशाल पाठक वर्ग के लिए यह नया संस्करण सगर्व प्रस्तुत करता है।

धर्मवीर भारती

बहुचर्चित लेखक एवं सम्पादक डॉ. धर्मवीर भारती 25 दिसम्बर, 1926 को इलाहाबाद में जनमे और वहीं शिक्षा प्राप्त कर इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्यापन-कार्य करने लगे । इसी दौरान कई पत्रिकाओं से भी जुड़े । अन्त में ‘धर्मयुग’ के सम्पादक के रूप में गम्भीर पत्रकारिता का एक मानक निर्धारित किया ।
डॉ. धर्मवीर भारती बहुमुखी प्रतिभा के लेखक थे। कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, निबन्ध, आलोचना, अनुवाद, रिपोर्ताज आदि विधाओं को उनकी लेखनी से बहुत कुछ मिला है। उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं : साँस की क़लम से, मेरी वाणी गैरिक वसना, कनुप्रिया, सात गीत-वर्ष, ठण्डा लोहा, सपना अभी भी, सूरज का सातवाँ घोड़ा, बन्द गली का आख़िरी मकान, पश्यन्ती, कहनी – अनकहनी, शब्दिता, अन्धा युग, मानव-मूल्य और साहित्य और गुनाहों का देवता।
भारती जी ‘पद्मश्री’ की उपाधि के साथ ही ‘व्यास सम्मान’ एवं अन्य कई राष्ट्रीय पुरस्कारों से अलंकृत हुए ।
4 सितम्बर, 1997 को मुम्बई में देहावसान ।
 

भूमिका

भारती की सृजन श्रृंखला में सात गीत वर्ष का एक विशिष्ट स्थान है। जिन महत्त्वपूर्ण कविताओं के कारण भारती ने नयी काव्यधारा में अपना सुनिश्चित प्रतिष्ठित स्थान बनाया उनमें से अधिकतर कविताएं इसी संकलन में संग्रहीत है।
इस संकलन की कविताओं का रचनाकाल 1951 से 58 तक है। यही वह समय है जब हिन्दी काव्यधारा एक विलक्षण ऐतिहासिक मोड़ ले रही थी। कविता के परम्परागत पुराने उपादानों को छोड़कर नये उपादानों की तलाश हो रही थी, परम्परागत छायावादी दृष्टिकोण के प्रति एक विद्रोह-सा उठ खड़ा हुआ था और भावुक गीतों में बौद्धिकता का अभाव महसूस किया जा रहा था। रस-सिद्धांत स्वयम् अब नई काव्य रचना के लिये उपयुक्त कसौटी रह गया है या नहीं, इस पर भी तीखी बहस शुरू हो गयी थी। पर पुरानी काव्य शैलियां फिर भी अवशिष्ट थीं। और दूसरी ओर वे काव्य रचनाएं आ रही थीं जिनमें एक आभिजात्य बौद्धिकता थी लेकिन वे हृदय को नहीं छू पाती थीं, नयी कविता या उस समय प्रचलित शब्द प्रयोगवादी कविता को लेकर बड़े-बड़े दावे जरूर करती थीं।
कारण चाहे कुछ भी रहे हों पर यह दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जायेगा कि उस समय कविता में व्यक्तिवादी या सामाजिक आग्रह की भूमिकाओं को बड़े भ्रमात्मक ढंग से उठाया गया। उस विवाद की व्याख्या करना यहां आवश्यक नहीं। केवल इतना कहना पर्याप्त होगा कि इस विवाद से ऊपर उठ कर जो कविता प्रतिष्ठित हुई उसके नए स्वर ने मूल्यों की सापेक्ष स्थिति में व्यक्ति और समाज दोनों को थामने का प्रयास आरंभ कर दिया था। उसका मुख्य प्रश्न, स्वयं भारती के शब्दों में, यह था कि “वे मूल्य कैसे पुनः स्थापित किये जायें जो व्यक्ति को इतना कायर और दुर्बल बनने से रोकें कि वह अपने सामाजिक दायित्व से पलायन कर आत्मरति में ही लीन रहे, या सामाजिक कल्याण के नाम पर आने वाले किसी भी अधिनायकवादी आतंक के सम्मुख समर्पण कर दे।” इसलिए इस कविता की आस्था मानव की मुक्ति, व्यक्ति और उसकी पीड़ा की मानवीयता पर थी। मानव की मुक्ति का मुख्य अभिप्रायः यह था कि वह अपनी सार्थकता खोज सके, अपना दायित्व खोज सके। उस समय केदार नाथ सिंह की एक कविता “फूल को हक दो” बहुत लोकप्रिय हुई थी, जिसमें उन्होंने बड़े सुन्दर प्रतीकात्मक ढंग से यह बात कही श्री-
लहर की हक दो… वह कभी संग पुरवा के
कभी संग पछुआ के, इस तटपर भी आये…उस तटपर भी जाये
और किसी रेती पर सिर रखकर सो जाय।
नयी लहर के लिए।
उस समय ‘दिनकर’ ने इस स्थिति की व्याख्या करते हुए लिखा कि ‘साहित्य गलत दिशा में उड़ता उड़ता एक ऐसी जगह पहुंच गया है, जहां भाषा लाचार है तथा कहने योग्य कोई भाषा या विचार नहीं है। कल्याण शायद पीछे लौटने अथवा उसे ‘जन-पथ’ पर वापस आने में है, जिसे धर्मवीर भारती ने ‘प्रभु-पथ’ कहा है।
उस दिन मैं दूंगा तुम्हें शरण,
मैं जन-पथ हूं,
मैं प्रभु-पथ हूं, मैं हूं जीवन।
जिस क्षितिज-रेख पर पहुँच
व्यक्ति की राहें झूठी पड़ जाती हैं,
मैं उस सीमा के बाद पुनः उठने वाला नूतन अथ हूं
मैं प्रभु-पथ हूं।
जिसमें हर अन्तर्द्वन्द्व, विरोध, विषमता का
हो जाता है, अन्त में, शमन।
सात गीत वर्ष की कविताओं को इस पृष्ठभूमि में देखना-समझना होगा। इन कविताओं में नयेपन के साथ एक ताज़गी भी थी। आडम्बर रहित सहज अभिव्यक्ति कितनी प्रखर होकर निखरी। ‘संक्रांति’, ‘अपराजित पीढ़ी का गीत’, ‘एक टूटा पहिया’, और ‘एक अवतार’ में इसके सुन्दर उदाहरण हैं। इस अभिव्यक्ति में एक ताज़ा गहरा युग बोध, इतिहास की सामूहिकता और कर्तव्य की निजी पीड़ा के बीच के तनाव की छटपटाहट है। लेकिन साथ ही इन कविताओं में एक समाधान खोजने की आस्था भी है। वास्तव में यह कविता मनुष्य की उस मानसिकता को उभारती है जो एक नयी भावभूमि निर्मित करके व्यक्ति और समाज के कृत्रिम विरोध का परिशमन कर सके।
भटके हुए व्यक्ति का संशय इतिहासों का अन्धा निश्चय ये दोनों जिसमें पा आश्रय बन जायेंगे सार्थक समतल ऐसे किसी अनागत पथ को पावन माध्यम भर है मेरी
आकुल प्रतिभा, अर्पित रसना।
(गैरिक वाणी)
इन सभी कविताओं ने भारती के काव्य व्यक्तित्व को सतही प्रगतिवाद और दुर्बाध आत्मकेन्द्रित प्रयोगवाद से अलग अपनी एक विशिष्ट प्रतिष्ठा दी।
सात गीत वर्ष के काव्य-वैभव का एक और पक्ष है। अन्यत्र मैने काफी विस्तार से यह विश्लेषण किया है कि अपनी सृजन-यात्रा के प्रारंभिक चरण में भारती ने प्यार के शाश्वत और चिरंतन रूप को किस प्रकार से परिभाषित किया है। जबकि ठंडा लोहा के ‘पान फूल सा मृदुल बदन’, ‘धरती पर लहराती बरसात सी चाल’, ‘सूने खंडहर के आसपास मदभरी चांदनी-सी सुन्दरता’ में एक कैशोर्य सुलभ भावुक रूमानियत है, सात गीत वर्ष में इस प्रेम में एक प्रगाढ़ अंतरंग दैहिकता के साथ-साथ प्रेमानुभूति के गहरे आयाम विकसित होने लगे हैं। ‘नया रस’, ‘नवम्बर की दोपहर’, ‘केवल तन का रिश्ता’, और ‘अर्द्ध स्वप्न का नृत्य’ से यह पक्ष स्पष्ट हो जायेगा। नए रस की व्याख्या कवि इस प्रकार करता है जिसमें श्रृंगार की आसक्ति नहीं, निर्वेद की विरक्ति नहीं, जब आकुल परिरम्भण की गाड़ी तन्मयता के क्षण में भी ध्यान कहीं और चला जाता है लेकिन फिर भी कवि यह स्वीकारता है-
अन्दर ज़हरीले अजगर-जैसे प्रश्नचिह्न
एक-एक पसली को अकड अकड़ लेते हैं
फिर भी बेकाबू तन
इन पिघले फूलों की रसवन्ती आग बिना
चैन नहीं पाता है।
(नया रस)
मुझे तो ऐसा लगता है कि उनकी परवर्ती कृति कनुप्रिया में जो भाव-बोध परिपक्व रूप में आया उसका बीजारोपण इस संकलन की इन्हीं प्रेम कविताओं में हुआ है। कनुप्रिया की सृजन-संगिनी को लीजिए-
यदि इस सारे सृजन, विनाश प्रवाह
और अविराम जीवन-प्रक्रिया का
अर्थ केवल तुम्हारी इच्छा है
तुम्हारा संकल्प
तो जरा यह तो बताओ मेरे इच्छामय,
कि तुम्हारी इस इच्छा का,
इस संकल्प का-
अर्थ कौन है?
इसी प्रसंग में यह भी कहना चाहूंगा कि ग्रीक पौराणिक पात्र प्रमथ्यु को नई व्याख्या देती हुई उनकी कृति ‘प्रमथ्यु गाथा’ में वही नाट्य चेतना और विद्रोह है जो उनकी कालजयी कृति अंधायुग में नए धरातल पर सम्प्रजित हुआ।
एक बात और। स्वयम् अपने कृतित्व और व्यक्तित्व के बारे में भारती स्वभाववश मौन रहे हैं। लेकिन सात गीत वर्ष की भूमिका में उन्होंने अपनी सृजन प्रक्रिया को जितने गहरे लेकिन सहज ढंग से परिभाषित किया वह अपने में स्वयम् एक उपलब्धि है। वह भूमिका इस संस्करण में भी अविकल रूप से दी जा रही है। विश्वास है कि भारती का विशाल पाठक वर्ग इस संस्करण का उसी भाव से स्वागत करेगा।
अपने इस नये रूप में यह पुस्तक काफी समय बाद पुनः प्रकाशित हो रही है। इस पुस्तक के इतने सुन्दर और सुरुचिपूर्ण प्रकाशन का श्रेय गगन गिल को है। भारतीय ज्ञानपीठ के प्रति गहरे अपनत्व के साथ जिस लगन और परिश्रम से उन्होंने यह कार्य किया है उसके लिए उन्हें धन्यवाद देना या उनके प्रति आभार प्रगट करना मुझे बहुत हल्का लगता है। ज्ञानपीठ के मेरे सहयोगियों, विशेषकर श्री चक्रेश जैन, की तो सदा की भांति पूरी सहायता मिली है।
1 मई, 1989
– बिशन टंडन
भारतीय ज्ञानपीठ

प्रथम संस्करण की भूमिका

क्षण,

काव्य-सृजन का,
सच है कि सबसे महत्त्वपूर्ण बिन्दु है-लेकिन शायद वही है जिसके बारे में स्वयं रचनाकार भी कठिनता से ही कुछ निश्चयपूर्वक कह सकता है। वैसे तो मन पर उस क्षण का स्वाद बहुत तीखा छूट जाता है लेकिन जब उसे प्रकट करने की चेष्टा करो तो लगता है कि यह तो न मालूम कितने जाने-अनजाने स्वादों का सम्मिलित स्वाद है जिसके संवेदन को ठीक-ठीक व्यक्त कर पाना असम्भव-सा ही है। एक हिचक मन में और होती है कि जो कुछ कहने-सुनने लायक था वह तो एक-एक बूँद काव्यकृति में उँडेलकर वह क्षण रीत गया, अब अपनी याद्दाश्त में उसे फिर से सम्पुंजित करने की चेष्टा भी करें तो ऐसा न हो कि उसका आस-पास, परिस्थिति, समय, स्थान और आसंग तो वापस खोजे जा सकें—मगर उसका मर्म, उसका सारतत्त्व छूट ही जाये। कई बार समकालीन लेखन में भी रचना-प्रक्रिया के ऐसे सांगोपांग विवरण देखने को मिले हैं ; पर उन्हें देखकर बहुधा यही भावना हुई है कि वे अजायबघर में रखे हुए जलपाखी हैं, खालमढ़े मृतरूप जिनमें रूप-रंग, आकार, पंजे, पंख सब जुटा दिये गये हैं किन्तु गायब है तो केवल उसकी उड़ान-पूर्णिमा की रात को चन्द्रमा और समुद्र के बीच उसकी आकुल आवेश-भरी उड़ान; और गायब है उसकी अजीब-सी चीत्कार-भय, वेदना, उल्लास, उन्मत्त वासना, विजय और आशंका से भरी हुई। अजायबघर का पाखी दूसरे दिन सुबह बालू पर छूट गया उसका अवशेष है-जलपाखी नहीं। एक ओर यह दुस्तर कार्य और दूसरी ओर यह मेरा अजीब-सा मन जिसे उन्मुख करो पूरब की ओर तो भागेगा धुर पश्चिम की ओर। नियोजित करो अपने काव्य-सृजन के क्षणों को पुनः स्मरण करने को, तो अदबदाकर उसे वे क्षण याद आयेंगे जो मन पर जाने कब अपनी छाप छोड़ गये हैं लेकिन काव्य-सृजन से उनका दूर का लगाव भी नहीं है। विन्ध्य की एक पहाड़ी नदी में अँधेरे का स्नान, अपने पुराने घर के उखड़े पलस्तरवाली एक दीवार पर कल्पित बेडौल शक्लें, कोणार्क के रास्ते में फरद के लाल उत्तप्त नोकीले फूल, बीमार पत्नी का मुरझाया चेहरा, तैरते हुए मछलियों के झुण्ड और यह, और वह, और तमाम सब, लेकिन सब परस्पर असम्बद्ध, और रचना के क्षण से जिनका कोई दूर का सूत्र भी नहीं जुड़ता।
लेकिन इन सबों के बीच रह-रहकर मन एक स्मृति-चित्र पर बार-बार जा टिकता है, बहुत पुराना, लेकिन अब भी बिलकुल ताज़ा कच्ची नींद से मुझे जगा दिया गया है और ले जाया जा रहा है घनघोर अँधेरे में गांव के बाहर ऊबड़-खाबड़ रास्ते पर से, खेत, टीलों, पोखरों के बीच से, मीलों दूर, नहरवाली अमराई में जहाँ देवकालिन का मन्दिर है। दीवाली की छुट्टियाँ मनाने बहन के घर आया हूँ, इस छोटे-से धूल-भरे उदास टूटे-फूटे पुराने कस्बे में जहाँ सूरज डूबते ही रात हो जाती है, सड़कें वीरान हो जाती हैं। मगर आज रात-भर अँधेरे में पगध्वनियाँ सुनाई देंगी क्योंकि आज आधीरात देवी की पूजा होती है और पीर के चबूतरे पर चादर चढ़ती है-उन पगध्वनियों में एक नन्हीं किशोर पगध्वनि मेरी भी है लेकिन डगमग, क्योंकि मेरी आँखों में अब भी नींद है और अधनींदा चल रहा हूँ और घरवाले मेरा हाथ पकड़े हैं। अच्छी तरह याद हैं मुझे वे क्षण। अधनींद में मुझे सामने कुछ नहीं दीखता सिवा टॉर्च से गिरा एक उजाले का गोल टुकड़ा जिसके पीछे मैं, और स्थिर है वह उजाले का वृत्त और स्थिर हूँ मैं-चल रही है केवल वह पगडण्डी, कंकड़, पत्थर, मेड़, खेत पर से सरकती आती हुई, उस उजले वृत्त में से टेढ़े-मेढ़े बलखाती हुई, मेरे पाँवों के नीचे विलुप्त होती हुई। खड़ा हूँ मैं-स्थिर, नींद डूबा और अँधेरे में चल रही है ख़ुशबुएँ कुछ जानी कुछ अनजानी-अभी नम पोखर की सर्द खुशबू अभी अँधेरे में सूखते उपलों की, अभी कटी हुई कुट्टी की, अभी बनतुलसा की, अभी जंगली कबूतरों के राखरंगे पंखों की…..मानों में स्थिर खड़ा हूँ और रास्ता और उसका परिपार्श्व अलसाता आता हुआ मुझमें से गुज़रता जाता है। कब रास्ता खत्म हुआ, कब अँधेरा फट गया, कब अकस्मात् शून्य में से एक जगमग दृश्य प्रकट हो गया मेरे सामने यह याद नहीं। सामने है मन्दिर, चबूतरा, गैस के हण्डे, शहनाइयाँ, झाँझ, हारमोनियम, कव्वाली, अगरबत्तियाँ, आते हुए लोग, जाते हुए लोग, पुकारते हुए लोग, बोलते हुए लोग। अब जाग गया हूँ मैं, जी रहा हूँ, सक्रिय हूँ। सब चीजें अपनी जगह स्थिर है, यहां तक कि बेहद शोरवाली भीड़ भी केतली में खलबलाते जल की तरह चंचल मगर अपनी परिधि में स्थिर है। चल रहा हूँ केवल मै। एक जगह गुमसुम खड़ा मैं आ रहा हूँ, जा रहा हूँ, इसमें से, उसमें से-इसके बगल से, उसके पास से नहर की पुलिया के पास गुमसुम खड़ा मैं। काफी देर हो चुकी है। घरवाले सुबह तक यहीं जागरण करेंगे। मुश्किल से इजाजत मिली है घर लौटने की अकेले। मैं मुड़ा-रोशनी का जगमगाता द्वीप पीछे मुड़ गया सामने है अँधेरे का विशाल समुद्र अथाह दूर तक फैला हुआ। दृश्यान्तर। लौट रहा हूँ जहाँ से आया था वहीं। सब कुछ वही है पर इतनी ही देर में । कहाँ है प्रकाशवृत्त के पीछे मेरी स्थिरता। कुछ भी तो वही नहीं। कहाँ है वे जो मेरे साथ हाथों में टॉर्च की रोशनी है लेकिन अथाह अँधेरे में क्षुद्र, असहाय, अनिश्चयग्रस्त, धुँधली, सहमी हुई, पथ के हर रोड़े से टकराकर टूटती हुई, हर झाड़ी में उलझकर तार-तार होती हुई और पहली बार तो नहीं थे, इस बार कहाँ से आ गये थे कटे पेड़ों के ठूंठ, प्रेत, झाड़ियों में छिपी अजाने भय की चमकती आदमखोर आँखें, पोखरों के अन्धे जलों पर तैरती गूँगी छायाएँ…. और मेरा गला सूखने लगा, कब पाँवों में से ताक़त जाने-सी लगी, मैं नहीं जानता और पहली बार, पहली बार मेरे उस किशोर मन को लगा कि मैं अथाह शून्य के समक्ष खड़ा हूँ। मृत्यु नहीं, आपदा नहीं, -शून्य।
पीछे मुड़कर देखा मन्दिर और रोशनी और भीड़-भाड़ अँधेरे में विलीन हो चुके थे। लगता था कि विशाल जलयान टूट गया और डूब गये लोग और अब मैं पुकारूँ भी तो कोई बचाने नहीं आयेगा।
और सामने देखा और याद करने में बच्चों को सुलाकर जागती हुई बहन का कोशिश की पुराना कस्बा और धीमी लालटेन ममता-भरा चेहरा–पर वह भी उस अँधेरे में नहीं दीखा, नहीं दीखा। वह ऐसा भविष्य लगा जो बीत गया अब, कितना भी चलूँ वापस नहीं मिलेगा। कितना अजीब अकेलापन-राह है, क़दम हैं, घर है लेकिन कुछ भी नहीं। एक विराट् अनस्तित्व। अँधेरा, अनिश्चय, विराट्, अथाह और उसके समक्ष मै निहत्था अपने अतीत और भविष्य से भी वंचित । जहाँ पहुँचा था वहाँ से चला हूँ, जहाँ से चला था वहाँ जा रहा हूँ, पर जहाँ पहुँचा था वह डूब चुका है और जहाँ जाना है वह पता नहीं अँधेरे के पार है भी या नहीं। शायद यह यात्रा हम जीवन-भर करते रहते हैं और कितनी बार, कितनी बार, यह अनस्तित्व, यह शून्य हमको जीने लगता है, और हम पाते हैं कि हमारा समस्त आस-पास उजाला, भीड़-भाड़, विज्ञान, दर्शन, अकस्मात् अनस्तित्व में लीन हो गया है। है, लेकिन नहीं है। अँधेरे में है हम–अकेले, निहत्थे, असहाय ! या शायद हम भी नहीं सिर्फ प्रगाढ़ अन्धकार में निहत्थे, हाथों की टटोल, खोज लेकिन फिर हम पाते हम बच गये है। होता क्या है कहना कठिन है। बाहर सिर्फ इतना होता है कि यन्त्रचालित गति में क़दम उठते जाते हैं। इस दौरान में अन्दर क्या घटित होता है इसका अनुमान करना कठिन है। शायद होता यह है कि हमारे अतीत और भविष्य का जगत् दोनों अकस्मात् मिथ्या पड़ जाते है। बीच में बच जाते है हम ;वर्तमान क्षण के वटपत्र पर ; और ताकि हम जीते रहें-संसार को पुनः उत्पन्न होता पड़ता है भय में से, यातना में से, शून्य में से। या शायद संसार यथावत् रहता है केवल अतीत और भविष्य से पूर्णतः विच्छिन्न होकर हम अपने अन्दर कहीं मृत हो जाते हैं और उस क्षण में फिर हम अपने को रचते हैं और फिर सबको नये सिरे से धारण करते हैं।  या शायद न संसार नष्ट होता है न हम। केवल हमारी पुरानी जगत्-चेतना अकस्मात् बिलकुल शून्य पड़ जाती है-अतीत और भविष्य के प्रति, बाह्य और अन्तर के प्रति हमारे सारे अद्यावधि स्थापित सम्बन्ध अकस्मात् टूट जाते है और हम फिर नितान्त शून्य में से उबरकर उन सम्बन्ध-सूत्रों को नये स्तर पर जोड़ते है और अपने नव-रचित सम्बन्धों के वर्तमान के आधार पर हम अपने अतीत और भविष्य की नित नूतन उपलब्धि करते हैं।शायदहाँ यह ‘शायद’ बहुत महत्त्वपूर्ण है। शायद इनमें से कोई एक प्रक्रिया घटित होती है, या शायद सब होती है, या शायद कोई नहीं होती। होती है कुछ और शायद हम भी रहते हैं और संसार भी। नष्ट कुछ नहीं होता। जहाँ से हम चलते हैं वह भी और जहां तक हम पहुँचते हैं वह भी। हम दोनों को जी चुके होते हैं, अपने में धारण किये हुए होते हैं लेकिन अकस्मात् किसी एक क्षण में हम पाते हैं कि यह सब है तो पर अकस्मात् हमारे लिए अर्थहीन हो गया है, अनिश्चित हो गया है। और हम विराट् शून्य में अकेले छूटते जा रहे है और हम अकेले छूटना नहीं चाहते। जीना चाहते हैं और अनस्तित्व में से अस्तित्व पाने के लिए अभिव्यक्त करना चाहते हैं अपने को, और बिना संसार के हम अपने को अभिव्यक्त कैसे करेंगे, अतः हम किसी एक स्तर पर मूल्य और अर्थ देते हैं हर चीज़ को और हर चीज़ के माध्यम से अपने को। पाये हुए और पाकर खोये हुए संसार को और किसी एक स्तर पर ‘रचते’ हैं। ऐसे स्तर पर जहाँ कुछ भी फिर कभी धुँधला और अर्थहीन न पड़े।
जीवन में जिये हुए अनुभवों, संवेदनों, पीड़ाओं और सुखों में तथा काव्य में रचे हुए पीड़ाओं, सुखों और संवेदनोंवाले जीवन में शायद यही सम्बन्ध है और यही अन्तररेखा। अपनी चरम निजी अनुभूति और व्यापक संसार, क्षण और निरवधि काल के बीच अँधेरी राह पर कहीं एक भूमि है जहाँ शून्य को पराजित कर हम ‘रचते’ हैं स्थायित्व देने के लिए और सार्थकता पाने के लिए। जो पाकर खोया जा सकता है उसे रचने के ऐसे बिन्दु पर उपलब्ध करने के लिए जहाँ से वह फिर खोया न जाये।
क्या ऐसा है कि समूची जीवन-प्रक्रिया अलग चलती रहती है और रचना-प्रक्रिया का यह घनीभूत क्षण अकस्मात् कभी रहस्यमय ढंग से अकारण आ जाता है। शायद नहीं। कितने ही क्षण हैं, कितनी स्थितियाँ हैं जो प्रत्यक्षतः असम्बद्ध लगती हैं पर कुल मिलाकर हमारे चेतन या अर्द्धचेतन मन में लहर पर लहर इस एक बिन्दु को उभारती रहती है। (क्या इसीलिए, जैसा मैंने प्रारम्भ में कहा, किसी एक क्षण को याद करने के बजाय मेरा मन जाने कहाँ-कहाँ भटक जाता है।) जब समूची जीवन-प्रक्रिया किसी न किसी रूप में रचना के क्षण से सम्बद्ध होती हैं तो वे लोग जो अकसर आरोप लगाते है कि अमुक कविता है तो मर्मस्पर्शी लेकिन जीवन से दूर है, वे कविता के बारे में क्या और कितना जानते है यह कहना कठिन है। जो खरा काव्य है उसकी रचना-प्रक्रिया में, कितने ही अप्रत्यक्ष रूप में हो, किन्तु जीवन-प्रक्रिया अनिवार्यतः उलझी रहती है।
कितनी विभिन्न स्थितियों में से, हम इस जीवन को उपलब्ध करते हैं। अधिकतर तो यह लगता है कि हम जी नहीं रहे हैं, जिये जा रहे हैं। कभी उस नींद-डूबी यात्रा की तरह खुद चलते हुए भी अहसास स्थिरता का होता है और लगता यह है कि हम ठहरे है पर बाकी सब हममें से गुज़रता जा रहा है। कभी खुद पुलिया के पास चुपचाप खड़े रहते हैं पर अहसास यह होता है कि बेशुमार भीड़ में से हम हरेक में से आ रहे है, जा रहे हैं। कभी अपने सात गीत-वर्षमें ‘सर्व’ का, ‘प्रत्येक’ का साक्षात्कार करना और कभी ‘सर्व’ में, ‘प्रत्येक’ में, अपना। ये सब जाने कितनी स्थितियाँ है जो रचना के क्षणों में सार्थक होती है। वह एक बिन्दु है जिसमें से सब संसरण करता है, पुनः रचे जाने के लिए।
और यह प्रक्रिया केवल कुछ चुने हुए अत्यन्त सुविधापूर्ण क्षणों में ही नहीं घटित होती। रोज़मर्रा की ज़िन्दगी के तथाकथित अत्यन्त गद्यात्मक नीरस काम, दफ्तर, बाज़ार, सौदा-सुलुफ़, हारी-बीमारी, रोज़गार के बीच भी रचनाकार का मन अनजाने चुपचाप काव्य-सृजन की भूमिका प्रस्तुत करता रह सकता है। इसलिए जाने कितने रूपों में कितने प्रकार से जीवन तथा बाह्य परिवेश काव्य-कृति में समाविष्ट होता चलता है। यही कारण है कि खरी काव्य-कृति का मुख्य गुण है सजीवता, अनायास सजीवता। और यही कारण है कि जब सहज रचना-प्रक्रिया में व्यवधान उत्पन्न कर प्रयासपूर्वक जीवन या जीवन की ऐसी व्याख्याएँ काव्य पर ज़बरदस्ती आरोपित करने की चेष्टा की जाती है, जो रचना के अपने आन्तरिक सृजन-विकास से उद्भूत नहीं हैं, तो वे निश्चित रूप से काव्य को निर्जीव ही बनाती है। जब भी काव्य में ‘दृष्टि’ उभरी है तो तभी जब रचनाकार के मन में दोनों ही स्तर स्वतः सजीव और सक्रिय रहे हैं, दोनों ही एक-दूसरे को अनुप्राणित भी करते चले हैं और अनुशासित भी, कभी विरोधी स्थितियों में, कभी समानान्तर स्थितियों में, कभी पूरक स्थितियों में।
निःसन्देह रचनाकार के मन की यह स्थिति काफी जटिल होती है। इस जटिल स्थिति को समझने या जी सकने में जो असमर्थ होते हैं वे अकसर इसे सरल करने की कोशिश करते है-इनमें से किसी एक स्तर को काटकर। सरलता की ओर अकाव्यात्मक पलायन का एक रूप वह होता है जब रचना-प्रक्रिया की अनिवार्य प्रकृतिगत माँगों की उपेक्षा कर जीवन की किसी एक संकीर्ण परिधि को ही सब कुछ सौंप दिया जाता है और कविकर्म केवल निर्देशित विषय (शास्त्र द्वारा, धर्म द्वारा, राजसत्ता द्वारा) नीति, आदेश, योजना, फतवों के पद्यान्तरण तक सीमित हो जाता है। ऐसे काव्य का खोखलापन जाहिर होते देर नहीं लगती। सरलता की ओर दूसरा अकाव्यात्मक पलायन है उनका जो समूची जीवन-प्रक्रिया और यथार्थ की कठोर भूमि से असम्पृक्त रहना चाहते हैं अतः वे रचना-प्रक्रिया को जीवन-प्रक्रिया से नितान्त पृथक्, कभी-कभी अनिवार्यतः विरोधी मान लेते हैं। वे कहते हैं कि उनकी काव्यप्रेरणा किसी दिव्य अशरीरी लोक से आती है, उनका रचनाकार ‘द्रष्टा’ और ‘स्वयम्भू’ है अतः साधारण प्राणी से कुछ ज्यादा ऊँचा है-और फिर यह तर्क यहाँ तक ले जाता है कि न केवल रचनाकार के ‘प्राण’, वरन् उसकी वेश-भूषा, बातचीत, तौर-तरीका, सब साधारण से कुछ पृथक् होनी अनिवार्य हो जाती है-लोकोत्तर- क्योंकि उसकी मृदु-मृदु प्रतिभा तो इस लोक में भटकी हुई अश्रुमय कोमल परदेशिनी है।
काव्य-सृजन की वास्तविक भूमि की जटिलता से ये दोनों मार्ग मुक्ति दिलाते हैं अवश्य यह बात दूसरी है कि इन दोनों मार्गों पर चलकर वह न मिले जो सम्पूर्णतः कविता है, या जो प्रौढ़ कविता है। कभी-कभी रोचक लगती है उनकी नियति जो कभी इस मार्ग पर भागते हैं कभी उस मार्ग पर और ज्यों-ज्यों आगे जाते हैं त्यों-त्यों मूलतः कविता से दूर होते जाते है।
इनसे बहुत अलग है वह भावस्थिति जो अपने को रचनाकार मानते हुए भी अपने को सामान्य से पृथक् नहीं मानती, रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में अपने को परदेशी नहीं मानती। ऐसे लोग असाधारणता का बाना नहीं ओढ़ते, सहज रूप में जीवन को सम्पूर्ण परिवेश में जीने के हामी है, व्यक्तित्व को हारते नहीं, जगत् को अस्वीकारते नहीं, और अपने हर अकेलेपन में अभिव्यक्ति के द्वारा अपने को ‘सर्व’ से ‘प्रत्येक’ से जोड़ने की चेष्टा करते हैं। राह उनकी अँधेरी होगी ही, पर इससे क्या, वे रचते भी तो उसी में से हैं।
काव्य-सृजन की इस जटिल भूमि पर, इस तमाम प्रक्रिया में से एक सजीव रचना उभरती आती है, मन के चेतन और अर्द्धचेतन स्तरों में से रूपायित होती हुई। कभी, धीरे-धीरे विभिन्न स्थितियों में से गुज़रते हुए, एक-एक कण बनते हुए, रचनाकार अपने चेतन अंश से उसे महसूस करता है। कभी-कभी रचना की प्रारम्भिक स्थितियों से रचनाकार का चेतन मन स्वतः अनवगत रहता है। जानता है तब, जब अकस्मात् उसका विस्फोट होता है। घण्टे-भर में, दो घण्टे-१ -भर में मोहाविष्ट-सा रचनाकार उसे प्रस्तुत कर देता है।
एक सप्राण सजीव रचना प्रस्तुत कर देने के बाद फिर रचनाकार का कार्य समाप्त हो जाता है।
उसके बाद फिर प्रक्रिया का दूसरा मोड़ प्रारम्भ हो जाता है जिसमें रचना सीधे पाठक के समक्ष होती है और रचनाकार बीच से हट जाता है। अब नये प्रश्न उठने लगते है : रचना में से पाठक क्या पाता है? क्या कवि ने जो अनुभव किया है उसका संवेदन पाठक को होता है? या वह अनुभव फिर नये सिरे से पाठक के मन में पुनःरचित होता है? या पाठक के मन में कविता से जो जागता है वह कोई तीसरा ही अनुभव है?
बहुत महत्त्वपूर्ण हैं ये प्रश्न-लेकिन इनसे कथा का दूसरा ही चरण प्रारम्भ होता है, जिसमें रचनाकार स्वतः तटस्थ जिज्ञासु-मात्र रह जाता है क्योंकि वह अब स्वरचित कृति और पाठक के बीच से हट गया है
1959
धर्मवीर भारती

अनुक्रम

1 प्रमथ्यु गाथा
2. नया रस
3. नवम्बर की दोपहर
4. फागुन के दिन की एक अनुभूति उत्तर नहीं हूँ
5. जिज्ञासा
6. संक्रान्ति
7. पराजित पीढ़ी का गीत
8. कौन चरण?
9. इनका अर्थ
10. गैरिक वाणी
11. केवल तन का रिश्ता
12. मेघ-दुपहरी
13. प्लेटफॉर्म
14. इतने दिन बाद
15. कस्बे की शाम
16. धूल-भरी आँधी का गीत
17. आँगन
18. अवशिष्ट
19. उपलब्धि
20. स्वयम् को दुहरायेगा?
21. साबुत आइने
22. रात अँधियारी : हवा तेज़
23. आस्था
24. निर्माण योजना
25. गुलाम बनानेवाले
26. एक वाक्य
27. बाणभट्ट
28. बृहन्नला टूटा पहिया
29. एक अवतार में
30. दान : प्रभु के नाम
31. अर्द्धस्वप्न का नृत्य
32. बातें
33. साँझ के बादल
34. यह ढलता दिन
35. धुँधली नदी में
36. शाम दो मनः स्थितियाँ
37. अँधेरे का फूल
38. यादों का बदन
39. आँगन बेली
40. ढीठ चाँदनी
41. दिन ढले की बारिश
42. शाम: एक थकी लड़की
43. अन्तहीन यात्री
44. एक छवि
45. चैत का एक दिन
46. फूल, सागर, सीपी
47. दूसरे दिन सुबह
48. अँजुरी भर धूप
49. घाटी का बादल
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